Showing posts with label poem. Show all posts
Showing posts with label poem. Show all posts

Sunday, November 10, 2013

Dhoondte reh jaaoge......


Dhoondte reh jaaoge......

This is a lovely poem by Arun Gemini. I relaly fell in love with this Poem the first time i have heard in SABB TV Show "WAH WAH KYA BAAT HAI".

We all know Times are changing fast. So many things we witnessed in our childhood appear to have vanished now. Soon many other old and traditional things will vanish. Our next generation will not ever see many things and traditions we saw. So here Here is excerpt from a lovely poem by Arun Jamini. He lists some amazing items that we sure would lose very soon.


Dhoondte reh jaaoge.....



Chizoon mein cheez, batoon mein baat 
21vi sadi mein vo hongi jinhe khoj nahi paoge dhoondte reh jaaoge.........

Aakhon mein pani, Dadi ki kahani
Nal mein jal, Pyaar ke do pal
Santo ki vaani, karn jaisa daani
Ghar mein mehmaan, Manushyata ka sammaan
Braj ka faag, Aag mein aag
Tarajoo mein batta, Aur ladkiyo ka dupatta
Dhoondte reh jaaoge....


Bharat sa bhai, Laxman sa anuyayi
Choodi bhari kalai, Shaadi mein shehnaai
Burai ki burai, Sach mein sachhai
Daridra ki holi, Aangan mein rangoli
Paropkaari bande, Aur arthi ko kandhe

Dhoondte reh jaaoge......

Aapas mein pyaar, Bhara poora parivar
2 rupaye udhaar, Neta imandaar
Dosti mein lihaz, Sangeet mein riyaaz
Sadak kinare pyaoo aur uncle ki jagah chacha Aur tau 

Dhoondte reh jaaoge......

Gaata hua gaon, Bargad ki chaaon
Mehnat ki aas, Chaach ka gilaas
Mehnat ka fal, Kisan ka hal
Lamba lamba ghoongat, Chehkta hua panghat
Lajja se thar thar kaapte aur pehlwaan ka langot 

Dhoondte reh jaaoge.....

Afsar jo Rishwat na khaaye,
Aisi biwi jo Rah dikhaye,
Kanoon jo Nyaye dilaaye,
Neta jo Paise na khae,
Adhyapak jo Sachmuch padhaye
Aisa baap jo Samjhaye
Aur aisa beta jo Samajh jaye

Dhoondte reh jaaoge.....

Dhoondte reh jaaoge.....

Dhoondte reh jaaoge....

Friday, June 28, 2013

चाँद का रातों में चमकना


चाँद का रातों में चमकना
अच्छा लगता है 
तेरे माथे की लकीरों में मेरा साथ 
बड़ा अच्छा लगता है 
तेरे लब्जों का जादू है या तिलस्म कोई 
हर शाम को तेरा साथ बड़ा 
अच्छा लगता है...!


Chand ka raaton mein chamkana
accha lagta hai
Tere maathe ki lakeeron mein mera saath
bada acha lagta hai
Tere lafzon ka jaadu hai ya tilasm koi
har shaam ko tera saath 
bada acha lagta hai

Friday, May 24, 2013

ANNIVERSARY,THOUGHTS & HUSBAND

ANNIVERSARY,THOUGHTS & HUSBAND

It seems it was only Yesterday that we met,talked over pone, have fought on little stupid things and then finally got married. This 11th May we completed 2 Years of our Marriage. To be Precise We have successfully completed 744 Days of Marriage. When I think of past what recalls me that we have recently married. but we have completed 2 Years. 
During these 2 years we fought each other, loved each other that makes our Love towards each other more promising and our bond has gone up high.
Our marriage was a arranged marriage but we both got a sufficient time to know and understand each other. He came to see me on 28th October 2010 and our Engagement was on Dec 12 2010. We got exactly 6 months to know and understand each other.
He was in Mumbai and i was in Bangalore. so it was not like we can meet each other regularly  So for the 5 months we did love fight with each other over phone and afterwards he came to Bangalore to Join his new organization. 
In Our first meeting we both were scared as what to talk and what not to. Slowly slowly we started knowing each other and which is still continuing for Us. and finally we got married and now completed 2 years of marriage. For completing  2 years of wonderful & happily married life with my sweet hubby i want to dedicate the following lines: 

हमारी शादी के दो साल पुरे होने पर अपने पति को क्या उपहार दूं 
मेरे पास थो कुछ भी ऐसा नहीं है  मैं सिर्फ कुछ शब्दॊन से ही उन्हें कह सकती हूँ 
आप जब से मेरी  ज़िन्दगी में  आएँ है तब से समां गए हो आप  मेरी बंदगी में 

मेरी हर साँस पर सिर्फ आपका  अधिकार है आप से ही मेरा संसार हैं 
मेरे  लिए आपके प्यार से बढकर कुछ भी नहीं है 
और आप जैसा प्यारा कोई दूजा भी नहीं हैं 

आपने हर पल दिल से साथ दिया है मेरा क्यों न दो आख़िर तू ही तो पिया है मेरा
आपके  प्यार के लिए तो कोई शब्द भी नहीं क्या गायुं आपके  लिए कोई तर्ज़ भी नहीं
बस इतना ही मैं तो कह सकती हूँ  आपके  बिना अब पिया मैं नहीं रह सकती

प्यार करती हूँ आपसे मैं इतना सनम कर दिया तेरे नाम मैने अपना जीवन
यह जीवन तो अब आपकी सौगात है जिसमे बस आपके प्यार की ही बरसात है     
माँग के देख लो पिया आपके लिए मेरी जान है हाज़िर आपकी हर ख़ुशी के लिए

आज करती हूँ मैं पिया वादा आपसे  साथ तेरा तो कुछ  नहीं  चाहिए मुझे
माफ़ कर देना मोरे पिया मेरी हर एक ख़ता साथ देना सदाचाहे दे लो सज़ा
आपके बिना मेरा जीवन है अधूरा सनम आप मिले मुझको यह मेरा अच्छा कर्म

एक वादा करो कभी छोड़ना नहीं बंधन प्यार का पिया कभी तोड़ना नहीं

Sunday, May 12, 2013

I don't know the Poet name of this Poem. But when read this poem i really liked. A mother do so many things for his children.


जीवन के 
इक्कीस वर्ष बाद, माँ 
जानी मैंने 
तुम्हारी पीड़ा 
जब अपना अंश 
अपनी बिटिया 
अपनी बाँहों में पाई मैंने। 

मेरे रोने पर 
तुम छाती से लगा लेती होगी मुझे, 
यह तो मुझे ज्ञात नहीं 
पर घुटने-कोहनी 
जब छिल जाते थे गिरने पर 
याद है मुझे 
तुम्हारे चेहरे की वो पीड़ा। 

तुम्हारी छाती का दर्द 
उतर आया मेरे भी भीतर, 
बेटी कष्ट में हो तो 
दिल मुट्ठी में आना 
कहते हैं किसे, 
जानने लगी हूँ मैं। 

मेरे देर से घर 
लौटने पर 
तुम्हारी चिंता और गुस्से पर 
आक्रोश मेरा 
आज कर देता है मुझे शर्मिंदा,
जब अपनी बेटी के 
देर होने पर 
डूब जाती हूँ मैं चिंता में। 

बेटी के अनिष्ट की 
कल्पना मात्र से 
पसलियों में दिल 
नगाड़े-सा बजता है 
तब सुन न पाती थी 
तुम्हारे दिल की धाड़-धाड़
.....
मैं मुरख। 

महसूस कर सकती हूँ 
मेरी सफलता पर तुम्हारी खुशी आज, 
जब बेटी 
कामयाबी का शिखर चूमती है...

क्षमा कर दोगी माँ, 
मेरी भूलों को, 
क्योंकि अब मैं जान गई हूँ 
कि बच्चे कितने ही गलत हो 
माँ सदा ही क्षमा करती है

Friday, April 12, 2013

जब मैं छोटा था..........शायद अब दुनिया सिमट रही है


Just read this Status on one of my Friend Facebook Status. I really loved it and thought this thought or Poem or Poetry is really worth sharing.
It truly reminds us of our Childhood days. Really by reading this we can easily say that Time has changed a lot. The day wen we were small, were really unforgettable days.

Now really people on our Bday just post on Facebook and wish us a Happy B'DAy. We people have hardly time for each other.
Its really touching.


जब मैं छोटा था,
शायद दुनिया बहुत बड़ी हुआ करती थी..
मुझे याद है मेरे घर से "स्कूल" तक का वो रास्ता,
क्या क्या नहीं था वहां,
चाट के ठेले, जलेबी की दुकान, बर्फ के गोले, सब कुछ,
अब वहां "मोबाइल शॉप", "विडियो पार्लर" हैं,
फिर भी सब सूना है..
शायद अब दुनिया सिमट रही है...!!

जब मैं छोटा था, शायद शामें बहुत
लम्बी हुआ करती थीं.. मैं हाथ में पतंग की डोर पकड़े,
घंटों उड़ा करता था,
वो लम्बी "साइकिल रेस", वो बचपन के खेल,
वो हर शाम थक के चूर हो जाना,
अब शाम नहीं होती, दिन ढलता है और सीधे रात हो जाती है.
अब शायद वक्त सिमट रहा है..!!

जब मैं छोटा था,
शायद दोस्ती बहुत गहरी हुआ करती थी,
दिन भर वो हुजूम बनाकर खेलना,
वो दोस्तों के घर का खाना, वो साथ रोना...
अब भी मेरे कई दोस्त हैं, पर दोस्ती जाने कहाँ है,
जब भी "traffic signal" पे मिलते हैं "Hi" हो जाती है,
और अपने अपने रास्ते चल देते हैं,
होली, दीवाली, जन्मदिन, नए साल पर बस SMS आ जाते हैं,
शायद अब रिश्ते बदल रहें हैं..!!

जब मैं छोटा था,तब खेल भी अजीब हुआ करते थे,
छुपन छुपाई, लंगडी टांग, पोषम पा, कट केक,
टिप्पी टीपी टाप. अब internet, office,
से फुर्सत ही नहीं मिलती..
शायद ज़िन्दगी बदल रही है...!!

जिंदगी का सबसे बड़ा सच यही है..
जो उस कबरिस्तान के बाहर बोर्ड पर लिखा था ...
"मंजिल तो यही थी,बस जिंदगी गुज़र
गयी मेरी यहाँ आते आते"

ज़िंदगी का लम्हा बहुत छोटा सा है...
कल की कोई बुनियाद नहीं है
और आने वाला कल सिर्फ सपने में ही है..

तमन्नाओं से भरी इस जिंदगी में
हम सिर्फ भाग रहे हैं..
कुछ रफ़्तार धीमी करो, मेरे दोस्त,
और इस ज़िंदगी को जियो खूब जियो मेरे दोस्त...!!

Sunday, March 17, 2013


This poem is written by Alok Kumar. When i read this poem for first time i was really impressed. This poetry is dedicated to all the youngster of India who to achieve something in their life. यह कविता उन सभी के लिए है जो अपनी लाइफ में कभी कभी इतना आगे बर जाते हैं की उन्हे कुछ भी नही दिखता. जब मैने ये कविता पड़ी मुझे लगा की यह कविता आज के नवयूको के लिए सही है.

I really loved this poetry and it touched my heart 




कोई औरत जब थपकी से, 
अपने बच्चे को सुलाती है! 
खुद तो धूप सहती है, 
बच्चे को आँचल ओढ़ाती है! 
तो यह देख कर, माँ तुम्हारी याद आती है!! 

पालने में सोता सोता, 
अचानक चौक के राये! 
चूल्हे पे खाना जलता, 
छोड़ के वो भागती है !! 
मेरे लाल का चेहरा कहीं लाल न हो जाये, 
रोते-रोते कहीं बेहाल न हो जाये!! 
माँ अपने बच्चे को खिलोने से खिलाती है, 
तो यह देख कर,माँ तुम्हारी याद आती है!! 

जब परीक्षा के दिन चिंटू घबराता है, 
किताब खोल के बस के पीछे भागता है! 
माँ भाग कर उसे दही चीनी खिलाती है, 
रास्ते के मंदिर में, हाथ जोड़ के जाना,
 कोई गरीब दिख जाये तो दो रुपये देते जाना! 
खाना परोस के परीक्षा का हाल पूछती है,
 फिर मंदिर में अच्छे नंबरों की मन्नत मांग आती है,
 तो ये सोच, आंखें नम, माँ तुम्हरी याद आती है !! 

पिता की डांट का सिलसिला, 
जब कम नहीं होता! 
माँ का पिता को समझाना की, डांटना कोई हल नहीं होता! 
इस बार जरूर कुछ करके दिखायेगा, 
अपने क्‍लास में अव्‍वल जरूर आएगा! 
चुपके चुपके से कहीं रो भी आती है , 
तो यह देख के माँ तुम्हारी याद आती है!! 

कॉलेज के दिनों में मस्ती करके घर देर से आना, 
फिर कोई पुराना सा बहाना बनाना, 
पिता से लड़ के, हर जिद चिंटू की पूरी कराती है, 
अपने बचे चुराए पैसे बेटे को दे देती है! 
हर गलती को माफ़ कर वो मुस्कुराती है 
तो ऐसे में माँ तुम्हारी याद आती है 

उम्र के साथ जिद की लिस्ट भी बढ़ती जाती है, 
अपनी पसंद की शादी की जिद, 
अलग रहने की जिद, विदेश जाने की जिद, 
अपनी तरह जीने की जिद, 
चिंटू की दुनिया में, अब वो नहीं रहती, 
माँ से बात करने की फुर्सत भी नहीं रहती, 
बिना उफ़, बिना शिकायत, माँ !!माँ!! 


बूढी माँ जब अंतिम सांसें गिनती है, 
और बार-बार, चिंटू के पिता से कहती है! 
अभी फ़ोन मत करना अमेरिका में दिन होगा, 
चिंटू किसी मीटिंग के बीच होगा!! 
चिंटू को खबर दे देना पर परेशान मत करना, 
मुझे आग दे देना और तस्वीर ईमेल कर देना!! 
इन अंतिम शब्दों से, जब दुनिया से जाती है, 
हर पल माँ बस तुम्हारी याद आती है!! 
ये जान जाती है! 
जहां रहो खुश रहो कहती जाती है, 
यह सोच आंखें नम, मां तुम्हरी याद आती 


Saturday, February 16, 2013

KOI DEEWANA KEHTA HAI

Koi deewana kehta hain koi pagal samjhta hain
magar dharti ki bechani ko bas badal samjhta hain
Main tujhse dur kaisa hu,tu mujhse dur kaisi hain
Yeh tera dil samjhta hain ya mera dil samjhta hain

Ke mohobbat ek ehsaason ki paawan si kahaani hain
kabhi kabira deewana tha kabhi meera diwaani hain
Yahaan sab log kehte hain meri aakho mein aasu hain
Jo tu samjhe toh moti hain jo na samjhe toh paani hain

Mat poooch ki kya haal hai mera tere aage
Tu dekh ke kya rang hain tera mere aage

Samandar peer ka andar hain lekin ro nahi sakta
Yeh aasu pyaar ka moti hain isko kho nahi sakta
Meri chahat ko dulhan tu bana lena magar sun le
Jo mera ho nahi paaya woh tera ho nahi sakta

Bhramar koi kumudni par machal baitha toh hungama
Humare dil mein koi khwaab pal baitha toh hungama
Abhi tak doob kar sunte the sab kissa mohobbat ka
Main kisse ko hakikat mein badal baitha toh hungama

Koi deewana kehta hain koi pagal samjhta hai
magar dharti ki bechaini ko bas badal samjhta hai
Main tujhse dur kaisa hu,tu mujhse dur kaisi hai
Yeh tera dil samjhta hai ya mera dil samjhta hai

mohobbat ek ehsason ki paawan si kahaani hai
kabhi kabira deewana tha kabhi meera diwaani hai
Yahaan sab log kehte hain meri aakho mein aansu hai
Jo tu samjhe toh moti hain jo na samjhe to paani hai

Bahut bikhra bahut toota thapede seh nahi paaya
Hawaaon ke ishaaron par magar main beh nahi paaya
Adhoora an suna hi reh gaya youn pyaar ka kissa
Kabhi tum sun nahi paaye, kabhi main keh nahin paaya

Bhramar koi kumudni par machal baitha toh hungama
Humare dil mein koi khwaab pal baitha toh hungama
Abhi tak doob kar sunte the sab kissa mohobbat ka
Main kisse ko hakikat mein badal baitha toh hungama

Main uska hun wo is ehsaas se inkaar karta hai
Bhari mehfil mein bhi ruswaa har baar karta hai
yaki hai saari duniya ko khafa hai humse woh lekin
Mujhe maaloom hai phir bhi mujhi se pyaar karta hai

Main jab bhi tez chalta hoon nazaare choot jate hain
Koi jab roop gadhta hoon to saanche toot jate hain
Main rota hoon to aakar log kandha thap thapate hain
Main hasta hoon to mujhse log aksar rooth jate hain

Mat poooch ki kya haal hai mera tere aage
Tu dekh ke kya rang hain tera mere aage

Samandar peer ka andar hain lekin ro nahi sakta
Yeh aasu pyaar ka moti hain isko kho nahi sakta
Meri chahat ko dulhan tu bana lena magar sun le
Jo mera ho nahi paaya woh tera ho nahi sakta

Sunday, January 27, 2013

ओ री चिरैया नन्ही सी चिड़िया अंगना में फिर आजा रे

ओ  री चिरैया
नन्ही सी चिड़िया 

अंगना में फिर आजा रे -2

अँधियारा है घना और लहू से सना 
किरनूं के तिनके अम्बर से चुन के 
अंगना में फिर आजा रे -2

हमने तुझपे हजारो सितम हैं किये 
हमने तुझपे  जहाँ भर के जुल्म किये
हमने सोचा नहीं 
तू जो उड़ जाएगी 
ये ज़मीन तेरे बिन सूनी रह जाएगी 
किसके दम पे सजेगा मेरा  अंगना 

ओ  री चिरैया
नन्ही सी चिड़िया 
अंगना में फिर आजा रे -2


तेरे पंखो में सारे सितारे जरू 
तेरी चुनर घनक से रंगीन बनू 
तेरी काजल में मैं काली रैना भरू 
तेरी मेहँदी में मैं  कच्ची धुप मलूँ तेरे नैनो सजा दूं नया सपना 
ओ  री चिरैया
नन्ही सी चिड़िया 
अंगना में फिर आजा रे -2

You Tube URL :http://www.youtube.com/watch?v=-HueKD1d0FA

Saturday, January 26, 2013

बेटी कविता



Beautiful lines for daughters; written by great Indian artist & Poet Mr. Shaliesh Lodha

क्या लिखू के वोह परियो का रूप होती हें?
की  कड़कती ठण्ड में सुहानी धुप होती हें
व्हो होती हें चिढिया की चेहचाहट की तरह
या कोई निश्चल खिलखालाहट होती हें?

क्या लिखू के वोह परियो का रूप होती हें?
की  कड़कती ठण्ड में सुहानी धुप होती हें
वोह होती हें उदासी के हर मर्ज़ की दवा की तरह
या उमस्म शीतल हवा की तरह

वोह चिढियो चेहचाहट हें?
या कोई निश्चल खिलखालाहट हें?
वोह आँगन में फैला कोई उजाला हें?
या मेरे गुस्से को लगा ताला हें?

पहाड़ की चोटि पर सूरज की किरण हें
वोह जिंदगी सही जीने का आचरण हें
वोह ताकत जो छोटे से घर को महल कर दे
वोह काफिया जो किसी ग़ज़ल को मुकम्मल कर दे

क्या लिखू?
क्या लिखू के वोह परियो का रूप होती हें?
की  कड़कती ठण्ड में सुहानी धुप होती हें
वोह अक्षर जो न हो तो वर्णमाला अधूरी हें
वोह जो सब से ज्यादा ज़रूरी हें
यह नहीं कहूँगा के वोह हर वक़्त सास सास होती हें
क्यू के बेटिया तो सिर्फ एक एहसास होती हें

क्यू के बेटिया तो सिर्फ एक एहसास होती हें
उसकी आँखे न मुझसे गुडिया मांगती हें
न मांगती हें कोई खिलौना
कब आओगे? बस एक छोटा सा सवाल सलोना

जल्दी आऊंगा !
अपनी मज़बूरी को छुपाते देता हूँ में जावाब
तारीख बताओ समय बताओ
वोह उंगलियो पे करने लगती हें हिसाब
और जब में नहीं दे पाता सही सही जवाब
आपने आंसुओ को छुपाने के लिए
वोह चहरे पर रख लेती हें किताब

वोह मुझसे विदेश में छुट्टिय
अच्छी गाडियो में घूमना
फाइव  स्टार में खाने
नए नए खिलोने नहीं मांगती
न की वोह ढेर सारे पैसे
अपने गुल्लक में उधेलना चाहती हें
वोह तो बस कुछ देर
मेरे साथ खेलना चाहती हें

पर वही बात बेटा काम हें
बोहत सारा काम हें
काम करना ज़रूरी हें
नहीं करूँगा तो कैसे चलेगा?
जैसे मज़बूरी हमें दुनिया दारी
के जवाब देने लगती हें

और व्हो जूठा ही सही मुझे एहसास कराती हें
जैसे सब बात वोह समज गयी हो
लेकिन आँखे बंध कर के व्हो रोंती हें
सपने में खेलते हुए मेरे साथ सोती हें
जिंदगी न जाने क्यू इतनी उलज जाती हें?
और हम समजते हें की बेटिया सब समज जाती हें

<<-- सैलेश लोधा -->>

Friday, September 21, 2012

आज फिर स्कूल जाने का दिल करता है

आज फिर स्कूल जाने का दिल करता है 

आज फिर स्कूल जाने का दिल करता है 

सुबह-सुबह जल्दी उठ नहाने का दिल करता है
स्कूल ड्रेस पहन टाई लगाने का दिल करता है 
आज फिर स्कूल जाने का दिल करता है |||||||

लाइन में लग कर प्रेयर  करने का दिल करता है 
एक दुसरे को धक्का दे आगे बढने का दिल करता है
आज फिर स्कूल जाने का दिल करता है |||||||||

क्लास के खाली पीरीयड  में एरोप्लाने उड़ाने का दिल करता है
लंच टाइम में एक दुसरे का टिफिन खाने का दिल करता है
आज फिर स्कूल जाने का दिल करता है |||||||||

क्लास में मैम का क्योस्चन पूछना और चुप चाप खड़े हो जाने का दिल करता है
होमेवोर्क न करना और क्लास में जाकर बहाने बनाने का दिल करता है
आज फिर स्कूल जाने का दिल करता है ||||||||||

सोसिअल साइंस के  पीरीयड  में सोने का दिल करता है
छुट्टी के इंतज़ार में बेल बजने का इंतज़ार करने का दिल करता है
आज फिर स्कूल जाने का दिल करता है ||||||||||||||

उन दोस्तों क साथ बातें करने, लड़ने झगरने का दिल करता है
सब कुछ भूल मस्त हो जाने और सपनो में खो जाने का दिल करता है 
आज फिर स्कूल जाने का दिल करता है ||||||||||||||

Sunday, June 17, 2012

बादल को घिरते देखा है

अमल धवल गिरि के शिखरों पर,
बादल को घिरते देखा है।

छोटे-छोटे मोती जैसे
उसके शीतल तुहिन कणों को,
मानसरोवर के उन स्वर्णिम,
कमलों पर गिरते देखा है,
बादल को घिरते देखा है।

तुंग हिमालय के कंधों पर
छोटी बड़ी कई झीलें हैं,
उनके श्यामल नील सलिल में
समतल देशों ले आ-आकर
पावस की उमस से
आकुल तिक्त-मधुर बिसतंतु खोजते
हंसों को तिरते देखा है।
बादल को घिरते देखा है।

ऋतु वसंत का सुप्रभात था
मंद-मंद था अनिल बह रहा
बालारुण की मृदु किरणें थीं
अगल-बगल स्वर्णाभ शिखर थे
एक-दूसरे से विरहित हो
अलग-अलग रहकर ही जिनको
सारी रात बितानी होती,
निशा-काल से चिर-अभिशापित
बेबस उस चकवा-चकई का
बंद हुआ क्रंदन, फिर उनमें
उस महान् सरवर के तीरे
शैवालों की हरी दरी पर
प्रणय-कलह छिड़ते देखा है।
बादल को घिरते देखा है।

दुर्गम बर्फानी घाटी में
शत-सहस्र फुट ऊँचाई पर
अलख नाभि से उठने वाले
निज के ही उन्मादक परिमल-
के पीछे धावित हो-होकर
तरल-तरुण कस्तूरी मृग को
अपने पर चिढ़ते देखा है,
बादल को घिरते देखा है।

कहाँ गय धनपति कुबेर वह
कहाँ गई उसकी वह अलका
नहीं ठिकाना कालिदास के
व्योम-प्रवाही गंगाजल का,
ढूँढ़ा बहुत किन्तु लगा क्या
मेघदूत का पता कहीं पर,
कौन बताए वह छायामय
बरस पड़ा होगा न यहीं पर,
जाने दो वह कवि-कल्पित था,
मैंने तो भीषण जाड़ों में
नभ-चुंबी कैलाश शीर्ष पर,
महामेघ को झंझानिल से
गरज-गरज भिड़ते देखा है,
बादल को घिरते देखा है।

शत-शत निर्झर-निर्झरणी कल
मुखरित देवदारु कनन में,
शोणित धवल भोज पत्रों से
छाई हुई कुटी के भीतर,
रंग-बिरंगे और सुगंधित
फूलों की कुंतल को साजे,
इंद्रनील की माला डाले
शंख-सरीखे सुघड़ गलों में,
कानों में कुवलय लटकाए,
शतदल लाल कमल वेणी में,
रजत-रचित मणि खचित कलामय
पान पात्र द्राक्षासव पूरित
रखे सामने अपने-अपने
लोहित चंदन की त्रिपटी पर,
नरम निदाग बाल कस्तूरी
मृगछालों पर पलथी मारे
मदिरारुण आखों वाले उन
उन्मद किन्नर-किन्नरियों की
मृदुल मनोरम अँगुलियों को
वंशी पर फिरते देखा है।
बादल को घिरते देखा है।

रिम-झिम वर्षा आई।

रिम-झिम, रिम-झिम वर्षा आई।

भीग रहे हैं पेड़ों के तन,
भीग रहे हैं आँगन उपवन,
हरियाली सबके मन भाई।
रिम-झिम, रिम-झिम वर्षा आई।।

मेंढक टर्र-टर्र चिल्लाते,
झींगुर मस्ती में हैं गाते,
आमों की बहार ले आई।
रिम-झिम, रिम-झिम वर्षा आई।।

आसमान में बिजली कड़की,
डर से सहमें लडका-लड़की,
बन्दर जी की शामत आई।
रिम-झिम, रिम-झिम वर्षा आई।।

कहीं छाँव है, कहीं धूप है,
इन्द्रधनुष कितना अनूप है,
धरती ने है प्यास बुझाई।
रिम-झिम, रिम-झिम वर्षा आई।।

विद्यालय भी तो जाना है,
होम-वर्क भी जँचवाना है,
मुन्नी छाता लेकर आयी।
रिम-झिम, रिम-झिम वर्षा आई।।

Thursday, June 14, 2012

HAPPY FATHER'S DAY

Daddy's Little Girl

As I look back to see
I remember times spent on your knee

When it came to my biggest fears
you came along to wipe away my tears
But as years started rushing by
I'll have to say with a sigh

You needed me just as bad
and those times were so sad

But now we're a family once more
and I know there's so much in store

You always seem to know when I need a smile
especially when you haven't seen one in a while

We seem to always be on the same page
even though there's a big difference in age

We know how to make each other laugh
and it makes time fly past

Daddy thats why I'm so thankful for you
I would never ask for anyone new

I love you so very much
because you help me with all my problems and such

I know you wish you could give me the world
but I'm proud enough with my title
"Daddy's Little Girl"

Saturday, November 5, 2011



We all miss our childhood. That carefree time of fun without worries never returns. We are for ever stuck with the grown up world of endless worries, apprehensions and ambitions. Here is a very famous poem of Subhadra Kumari Chauhan about that lovely childhood 

बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी।
गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी॥

चिंता-रहित खेलना-खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छंद।
कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद?

ऊँच-नीच का ज्ञान नहीं था छुआछूत किसने जानी?
बनी हुई थी वहाँ झोंपड़ी और चीथड़ों में रानी॥

किये दूध के कुल्ले मैंने चूस अँगूठा सुधा पिया।
किलकारी किल्लोल मचाकर सूना घर आबाद किया॥

रोना और मचल जाना भी क्या आनंद दिखाते थे।
बड़े-बड़े मोती-से आँसू जयमाला पहनाते थे॥

मैं रोई, माँ काम छोड़कर आईं, मुझको उठा लिया।
झाड़-पोंछ कर चूम-चूम कर गीले गालों को सुखा दिया॥

दादा ने चंदा दिखलाया नेत्र नीर-युत दमक उठे।
धुली हुई मुस्कान देख कर सबके चेहरे चमक उठे॥

वह सुख का साम्राज्य छोड़कर मैं मतवाली बड़ी हुई।
लुटी हुई, कुछ ठगी हुई-सी दौड़ द्वार पर खड़ी हुई॥

लाजभरी आँखें थीं मेरी मन में उमँग रँगीली थी।
तान रसीली थी कानों में चंचल छैल छबीली थी॥

दिल में एक चुभन-सी थी यह दुनिया अलबेली थी।
मन में एक पहेली थी मैं सब के बीच अकेली थी॥

मिला, खोजती थी जिसको हे बचपन! ठगा दिया तूने।
अरे! जवानी के फंदे में मुझको फँसा दिया तूने॥

सब गलियाँ उसकी भी देखीं उसकी खुशियाँ न्यारी हैं।
प्यारी, प्रीतम की रँग-रलियों की स्मृतियाँ भी प्यारी हैं॥

माना मैंने युवा-काल का जीवन खूब निराला है।
आकांक्षा, पुरुषार्थ, ज्ञान का उदय मोहनेवाला है॥

किंतु यहाँ झंझट है भारी युद्ध-क्षेत्र संसार बना।
चिंता के चक्कर में पड़कर जीवन भी है भार बना॥

आ जा बचपन! एक बार फिर दे दे अपनी निर्मल शांति।
व्याकुल व्यथा मिटानेवाली वह अपनी प्राकृत विश्रांति॥

वह भोली-सी मधुर सरलता वह प्यारा जीवन निष्पाप।
क्या आकर फिर मिटा सकेगा तू मेरे मन का संताप?

मैं बचपन को बुला रही थी बोल उठी बिटिया मेरी।
नंदन वन-सी फूल उठी यह छोटी-सी कुटिया मेरी॥

‘माँ ओ’ कहकर बुला रही थी मिट्टी खाकर आयी थी।
कुछ मुँह में कुछ लिये हाथ में मुझे खिलाने लायी थी॥

पुलक रहे थे अंग, दृगों में कौतुहल था छलक रहा।
मुँह पर थी आह्लाद-लालिमा विजय-गर्व था झलक रहा॥

मैंने पूछा ‘यह क्या लायी?’ बोल उठी वह ‘माँ, काओ’।
हुआ प्रफुल्लित हृदय खुशी से मैंने कहा – ‘तुम्हीं खाओ’॥

पाया मैंने बचपन फिर से बचपन बेटी बन आया।
उसकी मंजुल मूर्ति देखकर मुझ में नवजीवन आया॥

मैं भी उसके साथ खेलती खाती हूँ, तुतलाती हूँ।
मिलकर उसके साथ स्वयं मैं भी बच्ची बन जाती हूँ॥

जिसे खोजती थी बरसों से अब जाकर उसको पाया।
भाग गया था मुझे छोड़कर वह बचपन फिर से आया॥

Subhadra Kumari Chauhan