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Tuesday, July 26, 2011
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
रानी रोयीं रिनवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे
This poem written by Subhadra Kumari Chauhan reminds me of my child hood days when we used to learn this poem by heart;
यह कदंब का पेड़ अगर माँa होता यमुना तीरे
मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे
ले देतीं यदि मुझे बांसुरी तुम दो पैसे वालीमैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे
किसी तरह नीची हो जाती यह कदंब की डाली
तुम्हें नहीं कुछ कहता पर मैं चुपके-चुपके आता
उस नीची डाली से अम्मा ऊँचे पर चढ़ जाता
वहीं बैठ फिर बड़े मजे से मैं बांसुरी बजाता
अम्मा-अम्मा कह वंशी के स्वर में तुम्हे बुलाता
बहुत बुलाने पर भी माँ जब नहीं उतर कर आता
माँ, तब माँ का हृदय तुम्हारा बहुत विकल हो जाता
तुम आँचल फैला कर अम्मां वहीं पेड़ के नीचे
ईश्वर से कुछ विनती करतीं बैठी आँखें मीचे
तुम्हें ध्यान में लगी देख मैं धीरे-धीरे आता
और तुम्हारे फैले आँचल के नीचे छिप जाता
तुम घबरा कर आँख खोलतीं, पर माँ खुश हो जाती
जब अपने मुन्ना राजा को गोदी में ही पातीं
इसी तरह कुछ खेला करते हम-तुम धीरे-धीरे
यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे
Subhadra Kumari Chauhan
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